मिर्जा गालिब जीवनी | Mirza Ghalib Biography in hindi

 मिर्जा गालिब जीवनी| Mirza Ghalib Biography in hindi

Mirza Ghalib biography shayari in hindi गालिब का जन्म आगरा शहर में भारत में 27 दिसंबर 1796 को तुर्की कुलीन वंश में हुआ था। उन्होने अपने पिता और चाचा को बचपन में ही खो दिया था, ग़ालिब का जीवनयापन मूलत: अपने चाचा के मरणोपरांत मिलने वाले पेंशन से होता था  ग़ालिब की पृष्ठभूमि एक तुर्क परिवार से थी और इनके दादा मध्य एशिया के समरक़न्द से सन् १७५० के आसपास भारत आए थे। उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग खान अहमद शाह के शासन काल में समरकंद से भारत आये। उन्होने दिल्ली, लाहौर व जयपुर में काम किया और अन्ततः आगरा में बस गये।  मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग खान व मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग खान उनके दो पुत्र थे।

ऐसा कहा जाता है कि गालिब के सात बच्चे हुये, लेकिन दुख की बात है कि उनमें से कोई भी नहीं बचा। इसका दुःख उनकी कविता में साफ दिखता है। उनके मुकाबले उनकी पत्नी एक विरोधाभासी व्यक्तित्व की थी।

मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग (गालिब के पिता) ने इज़्ज़त-उत-निसा बेगम से निकाह किया और अपने ससुर के घर में रहने लगे। उन्होने पहले लखनऊ के नवाब और बाद में हैदराबाद के निज़ाम के यहाँ काम किया। १८०३ में अलवर में एक युद्ध में उनकी मृत्यु के समय गालिब मात्र ५ वर्ष के थे।

जब ग़ालिब छोटे थे तो एक नव-मुस्लिम-वर्तित ईरान से दिल्ली आए थे और उनके सान्निध्य में रहकर ग़ालिब ने फ़ारसी सीखी।

                         मिर्ज़ा गालिब जीवन परिचय

उपनाम: असद, ग़ालिब
जन्म: 27 दिसंबर, 1796
आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु: 15 फरवरी, 1869
दिल्ली, भारत
कार्यक्षेत्र: शायर
राष्ट्रीयता: भारतीय
भाषा: उर्दू एवं फ़ारसी
काल: १८०७-६९
विधा: गद्य और पद्य
विषय: प्रेम, विरह

शिक्षा

ग़ालिब की प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में स्पष्टतः कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन ग़ालिब के अनुसार उन्होने ११ वर्ष की अवस्था से ही उर्दू एवं फ़ारसी में गद्य तथा पद्य लिखने आरम्भ कर दिया था। उन्होने अधिकतर फारसी और उर्दू में पारम्परिक भक्ति और सौन्दर्य रस पर रचनाये लिखी जो गजल में लिखी हुई है। उन्होंने फारसी और उर्दू दोनो में पारंपरिक गीत काव्य की रहस्यमय-रोमांटिक शैली में सबसे व्यापक रूप से लिखा और यह गजल के रूप में जाना जाता है।

वैवाहिक जीवन

13 वर्ष की आयु में उनका विवाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गये थे जहाँ उनकी तमाम उम्र बीती। अपने पेंशन के सिलसिले में उन्हें कोलकाता कि लम्बी यात्रा भी करनी पड़ी थी, जिसका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों में जगह–जगह पर मिलता है।

कार्य

१८५० में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने मिर्ज़ा गालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के खिताब से सम्मानित किया।

शाही खिताब:

१८५० मे शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र २ ने मिर्ज़ा गालिब को “दबीर-उल-मुल्क” और “नज़्म-उद-दौला” के खिताब से नवाज़ा। बाद मे उन्हे “मिर्ज़ा नोशा” क खिताब भी मिला। वे शहंशाह के दरबार मे एक महत्वपुर्ण दरबारी थे। उन्हे बहादुर शाह ज़फर २ के ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार फ़क्र-उद-दिन मिर्ज़ा का शिक्षक भी नियुक्त किया गया। वे एक समय मे मुगल दरबार के शाही इतिहासविद भी थे।

शायरी:

गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के.

दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये
हुआ रक़ीब तो वो , नामाबर है , क्या कहिये
यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे
काजा से शिकवा हमें किस क़दर है , क्या कहिये
ज़ाहे -करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फरेब
की बिन कहे ही उन्हें सब खबर है , क्या कहिये
समझ के करते हैं बाजार में वो पुर्सिश -ऐ -हाल
की यह कहे की सर -ऐ -रहगुज़र है , क्या कहिये
तुम्हें नहीं है सर-ऐ-रिश्ता-ऐ-वफ़ा का ख्याल
हमारे हाथ में कुछ है , मगर है क्या कहिये
कहा है किस ने की “ग़ालिब ” बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके की आशुफ़्तासार है क्या कहिये.

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें ,
चल निकलते जो में पिए होते .
क़हर हो या भला हो , जो कुछ हो ,
काश के तुम मेरे लिए होते .
मेरी किस्मत में ग़म गर इतना था ,
दिल भी या रब कई दिए होते.
आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब ’,
कोई दिन और भी जिए होते.
दिले-नादां तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है.
हम हैं मुशताक और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है.
मैं भी मूंह में ज़ुबान रखता हूं,
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है.
जबकि तुज बिन नहीं कोई मौजूद,
फिर ये हंगामा-ए-ख़ुदा क्या है.
ये परी चेहरा लोग कैसे है,
ग़मज़ा-ओ-इशवा-यो अदा क्या है.
शिकने-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरी क्या है,
निगह-ए-चशम-ए-सुरमा क्या है.
सबज़ा-ओ-गुल कहां से आये हैं,
अबर क्या चीज है हवा क्या है.
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है.
हां भला कर तेरा भला होगा,
और दरवेश की सदा क्या है.
जान तुम पर निसार करता हूं,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है.
मैंने माना कि कुछ नहीं ‘ग़ालिब’,
मुफ़त हाथ आये तो बुरा क्या है.

घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता
तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर दिल है
कि अगर तंग न होता तो परेशां होता
वादे-यक उम्र-वराय बार तो देता बारे
काश रिज़वां ही दरे-यार का दरबां होता

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद कयों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाले-दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूं सवाबे-ताअत-ओ-ज़ोहद
पर तबीयत इधर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूं
वरना क्या बात कर नहीं आती
कयों न चीखूं कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती
दाग़े-दिल गर नज़र नहीं आता
बू भी ऐ बूए चारागर नहीं आती
हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरजू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
काबा किस मूंह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शरम तुमको मगर नहीं आती

मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वकत
मैं गया वकत नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं
जोफ़ में ताना-ए-अग़यार का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूं
ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या कसम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूं

म्रुत्यू:

ग़ालिब की मुगल दरबार में बहुत इज्जत थी और वो उन पर व्यग्य करने वालो पर शायरी लिख दिया करते थे | उनकी 15 फरवरी 1869 को दिल्ली में मौत हो गयी | ग़ालिब पुरानी दिल्ली के जिस मकान में रहते थे उसको ग़ालिब की हवेली कहा जाने लगा और बाद में उसे एक स्मारक में तब्दील कर दिया गया |ग़ालिब की कब्र दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में निजामुद्दीन ओलिया के नजदीक बनाई गयी.

 

Punit

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