फुटबॉल का इतिहास । Football history Hindi

फुटबॉल- फुटबॉल एक ऐसा खेल है जिसमें दो टीमें (आमतौर पर 11 खिलाड़ी ) एक गेंद को एक बचाव लक्ष्य में किक करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।

एसोशिएशन फुटबॉल जिसे आमतौर पर सिर्फ फुटबॉल या सॉकर कहा जाता है, दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है। यह एक सामूहिक खेल है और इसे 11 खिलाड़ियों के दो दलों के बीच खेला जाता है। फुटबाल को सामान्यत एक  आयाताकार घास या कृत्रिम घास के मेैदान पर खेला जाता है जिसके दोनों छोरों पर एक एक गोल होती है। खिलाड़ियों द्धारा विरोधी दल के गोल में चालाकी से गेद को डालना ही इस खेल का उद्देश्य है। खेल में गोलरक्षक ही एक मात्र ऐसा खिलाड़ी होता है जिसे गेंद को रोकने के लिए अपना हाथ इस्तेमाल करने की अनुमति होती है। दल के बाकी खिलाड़ी आमतौर पर गेंद को मारने (किक या पदाघात) के लिए अपने पैर का इस्तेमाल करते हैं। तथा कभी कभी हवा में गेंद को रोकने के लिए धड़ या सिर  का इस्तेमाल करते हैं। जो दल खेल के अंत यानि समय समा्प्ति तक यदि स्कोर बराबर रहे तो उस मुकाबले को बराबर या ड्रा घोषित करना, या खेल को अतिरिक्त समय में ले जाना और, या पेनाल्टी शूट आउट के द्वारा हार जीत का फैसला करना सब प्रतियोगिता के स्वरुप पर निर्भर करता है।

क्रिकेट को इतिहास

भारत में फुटबॉल का इतिहास-

जब फुटबॉल की चर्चा होनी शुरू हुई है तो भारत में उसके इतिहास पर भी थोड़ी चर्चा हो जाए। ज्यादातर खेलों के दुनिया भर में फैलने के पीछे उपनिवेशवाद का हाथ रहा है। कोई देश किसी देश को गुलाम बनाता था तो अपने कल्चर, अपने खान-पान के साथ-साथ अपने खेल को भी लेकर आता था।

 

भारत में 19वीं शताब्दी के बीच में क्रिकेट के साथ फुटबॉल भी ब्रिटिश ही लाए थे। इसे यहां ब्रिटिश सैनिकों के मनोरंजन के लिए शुरू किया गया था लेकिन इसे देश में लोकप्रिय किया नागेन्द्र प्रसाद सर्बाधिकारी ने। उन्हें ‘फादर ऑफ इंडियन फुटबॉल’ भी कहा जाता है। 1877 में उन्होंने कलकत्ता (कोलकाता) के हरे स्कूल में इसे लेकर माहौल तैयार करना शुरू किया। उन्होंने अपने दोस्तों से फुटबॉल खेलने को कहा। धीरे-धीरे इन लोगों ने स्कूल के मैदान में फुटबॉल खेलना शुरू किया। इससे यूरोपियन टीचर खुश हुए। उन्होंने सर्बाधिकारी से कहा कि इसे दूसरे स्कूलों और कॉलेजों तक ले जाओ।

नागेन्द्र प्रसाद सर्बाधिकारी

सर्बाधिकारी ने इसके बाद बॉयज क्लब बनाया और 1880 तक कलकत्ता में वेलिंग्टन क्लब समेत कई स्पोर्टिंग क्लब शुरू किए। सर्बाधिकारी ने जिस पहले लड़के को वेलिंग्टन क्लब में शामिल किया, उसका नाम था मोनी दास लेकिन वह कथित ‘नीची’ जाति से था इसलिए बाकी खिलाड़ियों ने उसे ‘अछूत’ मानते हुए उसके साथ खेलने से मना कर दिया। सर्बाधिकारी ने कहा कि खेलों में ये सब पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए लेकिन इस सड़- गली मानसिकता के आगे उनकी ना चली और 1884 में क्लब टूट गया।

इसके बाद उन्होंने सोवाबाजार क्लब बनाया। सर्बाधिकारी का अपने आदर्शों में विश्वास देखिए कि उन्होंने इस क्लब का पहला सदस्य भी मोनी दास को ही बनाया। मोनी दास बाद में फेमस मोहन बागान क्लब के कैप्टन रहे। उस वक्त यह जाति-व्यवस्था पर करारा तमाचा था। सर्बाधिकारी के बारे में सोचते हुए आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘लगान’ के भुवन की याद आती है, जिसने गांव वालों के विरोध के बावजूद ‘अछूत’ कचरा के कंधे पर पूरे विश्वास से हाथ रखते हुए कहा था, ‘आप लोग मेरा साथ दें या ना दें मगर कचरा खेलेगा।‘

डूरंड कप की शुरुआत

1888 में शिमला में भारत के तत्कालीन विदेश सचिव मॉर्टिमर डूरंड ने डूरंड कप शुरू किया। डूरंड कप एफए कप (फुटबॉल एसोशियन चैलेंज कप) और स्कॉटिश कप के बाद तीसरा सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट है।इसे भी भारत में तैनात ब्रिटिश सैनिकों के मनोरंजन के तौर पर शुरू किया गया था। कलकत्ता तब ब्रिटिश इंडिया की राजधानी थी इसलिए ये शहर फुटबॉल का हब बन गया, जिसका असर आज तलक है।

फुटबॉल क्लबों का दौर

इस समय भारत की सबसे पुरानी टीम मोहन बागान एसी 1889 में ‘मोहन बागान स्पोर्टिंग क्लब’ के नाम से शुरू हुई थी। इसे भूपेंद्र नाथ बोस ने शुरू किया था। ये पहला क्लब था जो आर्मी के अंडर था।

साउथ इंडिया में

भारत के दक्षिणी छोर पर सबसे पुराना क्लब है, आरबी फॉर्ग्युसन फुटबॉल क्लब। ये क्लब 20 फरवरी, 1899 को केरल के थ्रिसार में स्थापित हुआ। इसका नाम कोच्चि के एसपी आरबी फॉर्ग्युसन के नाम पर रखा गया था। बीसवीं सदी की शुरूआत में केरल में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने में ये क्लब आगे रहा।

आरबी फॉर्ग्युसन फुटबॉल क्लब

पहला भारतीय फेडरेशन इंडियन फुटबॉल एसोसिएशन 1893 में बना लेकिन इसमें कोई भी भारतीय नहीं था।

1900-1950 के बीच

इस दौरान बहुत से क्लब बनते रहे, टूर्नामेंट होते रहे लेकिन पहली बार भारत के खिलाड़ियों ने कोई बड़ा टूर्नामेंट 1911 में जीता। मोहन बागान एफसी ने ईस्ट यॉर्कशायर को आईएफए शील्ड के फाइनल में 2-1 से हराया।

मोहन बागान एफसी की टीम, 1911

1930 के दशक में भारत की टीम ने ऑस्ट्रेलिया, जापान, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड जैसे देशों का दौरा करना शुरू किया।

1950 के वर्ल्ड कप में भारत का क्वालीफाई करना

1950 के फीफा वर्ल्ड कप में भारत ने तुक्के से क्वालीफाई कर लिया था क्योंकि कई विपक्षी टीमों ने अपने नाम वापस ले लिए थे लेकिन तब ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) ने वर्ल्ड कप में ना जाने का फैसला किया था। फेडरेशन ने फीफा से कहा कि उसके पास यात्रा करने के पैसे ही नहीं हैं। फीफा कुछ खर्च उठाने को तैयार भी था लेकिन एआईएफएफ ने वर्ल्ड कप की जगह ओलंपिक में जाने को तरजीह दी।

गोल्डन पीरियड

1951 से 1962 का समय भारतीय फुटबॉल के लिए गोल्डन पीरियड माना जाता है। सैयद अब्दुल रहीम की कोचिंग में भारत की टीम एशिया में बेस्ट बन गई थी। 1956 और 1958 के ओलंपिक में भारत की टीम चौथे पोजीशन पर रही।

लेकिन…

कोच रहीम की मौत के बाद इस प्रदर्शन में गिरावट आनी शुरू हुई। 1966 के एशियन गेम्स में टीम पहले ही राउंड में बाहर हो गई। 70 के दशक के बीच में उन्होंने ईरान के साथ संयुक्त रुप से यूथ एशियन कप जीता, लेकिन इसके बाद 80 और 90 के दशक में और ज्यादा गिरावट आ गई।

किसी खेल को लोकप्रिय बनाए रखने में उसकी लोगों तक पहुंच भी मायने रखती है। 90 के दशक में पोस्ट लिबरलाइजेशन के दौर में दूरदर्शन की मदद से क्रिकेट घर-घर पहुंचने लगा। अलग-अलग कंपनियों ने अपने नाम से सीरीज प्रायोजित कीं। लोग ट्रैक्टरों की बैट्री तक लगाकर मैच देखते थे। इसकी चपेट में आकर हॉकी का भी वही हाल हुआ जो फुटबॉल का हुआ। लोगों ने देखना बंद कर दिया। कोई उत्साह बढ़ाने वाला ना रहा तो प्रदर्शन में भी गिरावट आने लगी। 1993 में लाहौर में फुटबॉल टीम ने सार्क कप जीता और दो साल बाद कोलंबो में रनर-अप रही। एआईएफएफ ने 1996 में नेशनल डोमेस्टिक लीग शुरू की, जो भारत की पहली लीग थी। लेकिन इन सब बातों की ज्यादा चर्चा भी नहीं हुई क्योंकि लोगों की रुचि नहीं थी।

वापसी

2006 में बॉब हाउस्टन को कोच बनाया गया तब 2007 में इंडिया टीम ने सीरिया को हराकर पहली बार नेहरू कप जीता। 2008 में एएफसी चैलेंज कप जीता और 2011 में कतर में होने वाले एएफसी एशिया कप के लिए क्वालीफाई किया।2009 में फिर से भारत ने नेहरू कप जीता और इस बार भी उसने सीरिया को हराया। 2011 में 27 सालों में भारत ने एएफसी एशिया कप में भाग लिया। ये कप इंडिया हार गई थी लेकिन इस टूर्नामेंट में भारत के वर्तमान कप्तान सुनील छेत्री ने भारत की तरफ से सबसे ज्यादा गोल किए थे।

फिर से उम्मीद जगी है

2011 के एएफसी एशिया कप के बाद फुटबॉल फेडरेशन ने इस खेल की ओर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है। फीफा के अंडर-17 वर्ल्ड कप के बाद उम्मीद है कि भारत में फुटबॉल की तरफ लोगों का रुझान बढ़े क्योंकि अब इंटरनेट मौजूद है और पहुंच की समस्या नहीं है। समस्या बस खिलाड़ियों को सुविधाएं दिए जाने और इस खेल में निवेश किए जाने की है। बाकी भारत के लोग इस खेल में धीरे-धीरे अपनी रुचि खुद ही जगा लेंगे।

आधुनिक फुटबाल को इंग्लैंड में द फुटबॉल एसोशिएशन के गठन के साथ कूटबद्ध किया गया और जिसके 1863 में बने लॉज अॉफ द गेम खेल के कानून के आधार पर आज फुटबाल खेली  जाती है। अंतर्राष्ट्रीय आधार पर फुटबाल का नियंत्रण फेडरेशन इंटरनेशनल डी फुटबॉल एसोशिएशन या एसोसिएशन फुटबाल का अतर्राष्ट्रीय महासंघ जिसे संक्षेप में फीफा या कहा जाता है। फुटबाॉल की सबसे प्रतिष्ठित अँतर्राष्ट्रीय  और लोकप्रिय प्रतियोगिता फीफा विश्वकप है, जिसके आयोजन हर चौथे वर्ष किया जाता है। इस प्रतियोगिता को व्यापक रुप से पूरे विश्व में देखा  जाता है और इसके दर्शक ग्रीष्मकालीन ओल्म्पिक खेलों को मिले दर्शकों से लगभग दुगने होते हैं।

खेल के नियम-

फुटबॉल कुछ नियमों के अनुसार खेेले जाता है जिसे खेल का नियम कहा जाता है यह खेल एक गोल गेंद का उपयोग करते हुए खेला जाता है, जो फुटबॉल के नाम से जाना जाता है ग्यारह खिलाड़ियों की दो टीमें होती हैं जिसमें प्रत्येक खिलाड़ी दूसरी टीम  के गोल पोस्ट में गेंद ़डालने की कोशिश करती हैे जिससे गोल प्राप्त किए जाते हैं जो टीम के अंत तक ज्यादा गोल करती है वह टीम विजेता टीम होती है, अगर दोनों टीमें समान गोल करते हैं तो खेल ड्रा हो जाती हैें।आधिकारिक खेल के नियम में सत्रह नियम हैं। फुटबॉल के सभी स्तर में वही नियम लागू होते हैं जबकि कुछ समूहों जैसे जूनियर, बुजुर्ग या महिलाओं के लिए कुछ संशोधन की अनुमति दी जाती है। अक्सर नियम व्यापक दृष्टि के लिए बने होते हैं, जो खेल के स्वरुप के आधार पर लचीलापन प्रदान करते हैं। सत्रह नियमों के अलावा आईऍफ़ऐबी के कई फैसलें और अन्य निर्देश फुटबॉल के नियमन में योगदान देते हैं। फीफा के द्वारा खेल के नियम प्रकाशित किए गए हैं लेकिन फीफा के द्वारा ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय फुटबाल एसोसिएशन बोर्ड के द्वारा बनाये रखा गया है। 

पिच –

अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए पिच की लम्बाई १००-110 मीटर की श्रेणी में है (110-120 यार्ड) और चौडाई 64-75 मीटर की श्रेणी में है (70-80 यार्ड) गैर अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए 91-120 मीटर लम्बाई हो सकता है (100-130 यार्ड) और चौडाई 45-91 मीटर (हो सकता है अगर पिच एक वर्ग नहीं बनता है। सबसे बड़ी सीमा रेखाएं टच रेखाएंया किनारे की रेखाएं हैं जबकि छोटी सीमा (जहाँ से गोल मारा जाता है)गोल की रेखाएं हैं। आयताकार गोल प्रत्येक गोल रेखा के मध्य पर स्थित होती है। पूरे मैदान में ऊर्ध्वाधर गोल पोस्ट का भीतरी किनारा 7.३ मीटर अवश्य होता है (8 यार्ड) इसके आलावा क्षैतिज क्रॉसबार जो गोल पोस्ट द्वारा समर्थित होती, का निचला छोर 2.44 मीटर होना चाहिए (8 फीट) आम तौर पर जाल गोल के पीछे रखा जाता है, लेकिन कानून के अनुसार उसकी कोई आवश्यकता नहीं है।

 

Sheshnath Maurya

Sheshnath Maurya is B.tech engineer .

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